Monday, 26 August 2019

यात्रा वृतांत - मेरी पोलैंड यात्रा, भाग-4


विदेशी धरती में देशी जायके से रुबरु

आज रविवार का दिन था। दिन भर प्रेजन्टेशन की तैयारियाँ चलती रहीं। आज की शाम बिडगोश शहर के एकमात्र भारतीय रेस्टोरेंट - रुबरु के नाम थी, जिसके दर्शन हम पिछले कल भ्रमण के दौरान मिल्ज टापू में कर चुके थे। काजिमीर यूनिवर्सिटी की इंटरनेशल रिलेशन विभाग की मेडेम जोएना काल्का हमें लेने अपनी गाड़ी में आती हैं। यहाँ आने से पूर्व मेल्ज के माध्यम से मैडेम का शाब्दिक परिचय हो चुका था। भारत में काल्का शब्द काली माता से जुड़ा हुआ है, जैसे चंडीगढ़ शिमला के बीच काल्का मंदिर व शहर, बैसे ही दिल्ली में काल्का मंदिर प्रख्यात है। गुरु गोविंद सिंहजी की आत्मकथा विचित्र नाटक में भी काल्का आराधना का रोमाँचक जिक्र मिलता है। खैर, इन भावों के साथ मैडेम का नाम आसानी से हमें याद था, आज प्रत्यक्ष मैडेम का परिचय हो रहा था, जो एक सरल, सुगड़, सजग एवं सज्जन महिला निकली। हमारे प्रवास के अंतिम पड़ाव तक जरुरत पड़ने पर इनका भावभरा सहयोग साथ रहा। शहर की स्पाट, सुंदर सड़कों के बीच कुशलतापूर्वक ड्राइविंग करती हुई मेडेम काल्का हमें अपने गन्तव्य की ओर ले जा रही थी। पिछले दो दिनों में जिस मार्ग को हम पैदल तय कर रहे थे, आज गाड़ी में बैठकर उसका विहंगावलोकन हो रहा था।
रुबरु में जाने से पहले गाड़ी को पार्क करना था। लेकिन शहर में इस समय पार्किंग स्थान बुक थे। उचित पार्किंग स्थान की खोज में हमने मेडेम को टापू की तीन परिक्रमा करते हुए देखा, जो यहाँ पार्किंग के अनुशासन की बानगी पेश कर रहा था, जिससे हम कुछ सीख सकते हैं। अपने यहाँ तो पार्किंग के ऐसे अनुशासन की बात तो दूर, नो पार्किंग जोन में ही पार्किंग करना जैसे चलन बन चुका है। पार्किंग के संदर्भ में यहाँ का सार्वजनिक अनुशासन हमें अनुकरणीय लगा।
रुबरु में काल्का मेडेम की बॉस मैडेम एनिला बेकर (इंटरनेशनल विभाग की हेड़) अपने पति आरेक व दो बेटों के संग इंतजार कर रही थीं। मेडेम एनिला देवसंस्कृति विवि आ चुकी हैं व भारतीय व्यंजनों का स्वाद चख चुकी हैं व इनकी मुक्तकँठ से प्रशंसा करती रही हैं। आज मेडेम सपरिवार हमको यहाँ के भारतीय स्वाद से रुबरु करा रहीं थी। मेडेम बहुत मिलनसार, खुशमिजाज, स्मार्ट एवं कड़क महिला हैं, पति भी उतने ही बातूनी, मस्तमौला एवं मजेदार। दोनों बेटे पहली बार मिलने के कारण थोड़ा गंभीर व संकोच कर रहे थे, डीलडोल में उमर से अधिक ऊँचे व भारी भरकम थे। आज पहली बार पता चला कि यहाँ आहार में माँसाहार का चलन कितना आम है। शायद ही कोई वाशिंदा हो जो पूर्णत्या शाकाहारी हो। यहाँ तक कि सलाद में तक मछली को स्टफड पाया। लगा शायद यहाँ की जरुरत के हिसाब से भोजन का चलन रहा होगा, ठंड़ा इलाका होने के कारण यहाँ तापमान माइनस 10-15 तक रहता है, क्योंकि अधिकाँश समय यहाँ शाकाहारी सब्जियां, अन्न, दाल आदि कम मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। फिर इनके पूर्वज स्लाव भी ठंड़े इलाकों से आए, तो परम्परागत रुप में ऐसे आहार के चलन को समझने की कोशिश कर रहा था।
प्रीतिभोज के साथ पोलैंड व भारत के खानपान व दर्शन की चर्चा होती रही। पहली बार एग्नोस्टिक से हमारा परिचय हो रहा था। आरेक स्वयं को एग्नोस्टिक मान रहे थे। कभी वे यहाँ के प्रचलित चर्च में कुछ माह-साल मोंक तक रह चुके हैं, व अन्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक मार्गों को भी आज्माँ चुके हैं, लेकिन सबसे मोहभंग के बाद अब वे एग्नोस्टिक हो चुके हैं। सब धार्मिक परम्पराओं का सम्मान करते हैं, लेकिन किसी में अधिक आस्था ऩही रखते। हमारे लिए यह एक नया व रुचिकर प्रसंग था। ऐसा भी होता है व क्यों होता है, जानने-समझने की हम कोशिश कर रहे थे।
रुबरु का मालिक तो पोलिश ही था, बात करने पर पता कि वेटर व शैफ देशी ही है, हमने मिलने की इच्छा जाहिर की तो, कुछ ही मिनट में चिरंजीवी शर्मा हमारे सामने थे, नेपाली मूल के बेटर व शैफ, जो पिछले कुछ वर्षों से यहाँ काम कर रहे हैं। पोलैंड के बड़े शहरों में रुबरु रेस्टोरेंट की श्रृंखला है, पता चला कि यहाँ के पास के शहर तोरुन में भी रुबरु रेस्टोरेंट है, जिसमें इनके मित्र काम करते हैं, जहाँ अगले दिनों हम विजिट करने वाले थे।
यहाँ तृप्तिदायक भोजन करने के बाद हम फिर टापू के बीच बर्दा नदी को पार करते हुए औपेरा नोएवा में पहुँचे, जो शहर का मुख्य कलाकेंद्र है, जो पता चला कि वर्षों की मशक्कत के बाद भारी-भरकम बजट में तैयार किया गया है व आज इस आधुनिक शहर की सांस्कृतिक पहचान है। शहर के संभ्रांत परिवारों को यहाँ पधारते देखा। संडे के दिन यहाँ विशेष चहल-पहल रहती है। मेडेम काल्का की फैमिली भी यहाँ जुड़ चुकी थी, इनके प्रोफेसर पति व तीन प्यारी एवं सुसंस्कृत बेटियों के साथ। यहाँ थियेटर नुमा भवन में जैसे हम बाल्कोनी में थे। नीचे स्टेज पर कार्यक्रम लगभग दो घंटे चला। भाषा तो समझ में नहीं आयी (मूल फ्रेंच में लिखा गया था व पोलिश में अनुदित हो रहा था), लेकिन भावों की गहनता एवं संगीत की सुर लहरियों को अनुभव करते रहे। संगीत टीम में दर्जनों लोग शामिल थे, और थियेटर में 100 से अधिक कलाकार नाटक को अंजाम दे रहे थे। कहानी कुछ-कुछ प्रेमी, शैतान व दैवीय शक्तियों के बीच के संघर्ष को दर्शा रही थी। शैतान का प्रलोभन, पात्र के भाव की पावनता व दैवीय सहयोग आदि इसका विषय लगे। किसी प्रख्यात नाटककार के उपन्यास का यह नाटय रुपांतरण हो रहा था।
यहाँ उच्च घराने के लोग ही अधिकांशतः लोग पधारे थे। उनको नाटक कितना समझ आता है, क्या भाव लेकर जाते होंगे, कह नहीं सकते। लेकिन उनके सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा अवश्य लगा। संगीत, संस्कृति, कला से जुड़ने का एक प्रयास प्रतीत हुआ। इसी मिल्ज टापू में पिछले कल भी ऐसे ही कला केंद्र व म्यूजियम हम कल देख चुके थे, जिससे लगा कि यहाँ अपनी संस्कृति, कला आदि को महत्व दिया जाता है, जिन्हें अपनी जड़ों से जुड़े रहने के प्रयास क रुप में देखा जा सकता है।
इसी बीच अध्यात्म पर भी गहन चर्चा होती रही। लगा धर्म का पारंपरिक रुप यहां भी दम तोड़ रहा है। मालूम हो कि पोलैंड विश्व का सबसे बड़ा कैथोलिक चर्च आवादी वाला देश है, जो लगभग कुल आबादी के 87 फीसदी हैं। लेकिन लगा कि विज्ञान और आधुनिकता में पली-बढ़ी पीढ़ी को प्रचलित धर्म अपने पारम्परिक तौर-तरीकों से संतुष्ट नहीं कर पा रहा। हमारी जिज्ञासा धर्म के आध्यात्मिक स्वरुप को समझने की अधिक थी, जिस पर गहराई से चर्चा के लिए कोई व्यक्ति भी नहीं मिला। इतना स्पष्ट था कि धर्म का पारम्परिक स्वरुप प्रबुद्ध वर्ग पर पकड़ खो रहा है, फिर धर्म में जैसे भारत में गढ़बढ़ झाला चल रहा है, कुछ ऐसा ही यहाँ भी दिखा। शायद यह एक वैश्विक समस्या है, जहाँ धर्मक्षेत्रों में विकृतियों का प्रवेश एवं नाना प्रकार की शौषण की घटनाएं इसके पावन स्वरुप को धुमिल कर रही हैं।
रास्ते में आईसक्रीम पार्लर में आइसक्रीम का लुत्फ लिए। यहाँ सभी के बाल भूरे व सफेद होते हैं, क्या बुढ़े, क्या जवान या बच्चे। काले बाल तो अपवाद रुप में ही किसी के होते हों। पार्लर में बुढी अम्माओं को भी बनठनकर आइसक्रीम का आनन्द लेते देखा। यहाँ के लोकजीवन को देख जीवन के उच्च जीवन स्तर की झलक स्पष्ट दिख रही थी। हम एक विकसित देश के आठवें सबसे बड़े शहर में थे। तेजी से विकसित होता देश यूरोप में अपना महत्वपूर्ण स्थान गढ़ रहा है।
नदी के किनारे बने विश्राम स्थलों में लोग प्रकृति का पूरा आनन्द ले रहे थे। पास में बह रही बर्दा नदी से निकली जलधार, ऊपर आकाश छूते हरे-भरे पेड़, चारों और प्रकृति के सुरम्य आँचल में बसा शहर, लोक प्रकृति से एकात्म, लयबद्ध जीवन का आनन्द ले रहे थे। पूरा नजारा चित्त को आल्हादित कर रहा था। देश-परिवेश कोई भी हो प्रकृति तो प्रकृति ठहरी, माँ की तरह वह जैसे अपनी गोद में आए शिशुओं को दुलार रही थी, परमेश्वर का सुमधुर संगीत सुनाकर अपने शिशुओं के जीवन को शांति-सुकून व आनन्द से रंग घोल रही थी।
इस तरह आज की शाम रुबरु व ओपेरा नोएवा के नाम रही, रात के 9 बज चुके थे, लेकिन यहाँ तो यह ढलती शाम का समय था। 9,30 बजे तक यहाँ अंधेरा छाता है। वापसी में मेडेम एनिला अपनी कार में हमें हमारे विश्राम स्थल पर छोड़ती हैं। कल यूनिवर्सिटी में मिलने के वायदे के साथ विदाई होती है, जो हमारा कैंपस में पहला विजिट होने वाला था, जिसका हमें बेसव्री से इंतजार था। (शेष अगली पोस्ट में....)

Monday, 19 August 2019

हे सृजन साधक, हर दिन भरो कुछ रंग ऐसे


मिले जीवन को नया अर्थ और समाधान
हर दिवस, एक नूतन सृजन संभावना,
प्रकट होने के लिए जहाँ कुलबुला रहा कुछ विशेष,
एक खाली पट कर रहा जैसे इंतजार,
रचना है जिसमें अपने सपनों का सतरंगी संसार।1।

आपकी खूबियां और हुनर हैं रंग जिसके,
अभिव्यक्त होने का जो कर रहे हैं इंतजार,
 अनुपम छटा बिखरती है जीवन की या होता है यह बदरंग,
तुम्हारे ऊपर है सारा दारोमदार।2।


शब्द शिल्पी, युग साधक बन, हो सकता है सृजन कुछ मौलिक,
जिसे प्रकट होने का है बेसव्री से इंतजार,
आपके शब्द और आचरण से मिलेगी जिसे अभिव्यक्ति,
झरेगा जिनसे आपका चिंतन, चरित्र और संस्कार।3।

अतः हे पथिक, बन सृजन साधक,
भरो जीवन में हर दिन रंग कुछ ऐसे,
 झरता हो जिनमें जीवन का भव्यतम सत्य,
मिलता हो जहाँ जीवन को नया अर्थ और समाधान।4।
 

Wednesday, 31 July 2019

यात्रा वृतांत, मेरी पौलेंड यात्रा, भाग-3


बिडगोश शहर के ह्दयक्षेत्र में पहली शाम


संयोग से आज शनिवार था, बुद्धपूर्णिमा का पावन दिन था। अगले दिनों प्रस्तुत होने वाली पीपीटी की तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थीं। फिनिशिंग टच व अभ्यास शेष था। पहली शाम विश्राम के बाद आज दूसरी शाम बिडगोस्ट शहर के भ्रमण के नाम थी। विश्वविद्यालय की ओर से नामित मनोविज्ञान की छात्रा डोमिनिका के साथ यह सम्पन्न होता है। विवि परिसर के साथ सटे प्रकृति की गोद में बसे पार्क से गुजरना एक भव्य अनुभव रहा। क्रिसमस ट्री पार्क की शोभा में चार चाँद लगा रहे थे। पता चला कि यहाँ इसकी कई तरह की किस्में पायी जाती हैं। यहाँ रास्ते भर सड़क के दोनों ओर तथा पार्क में झाड़ियां एवं वृक्ष फूलों से लदी हुईं थी। हमें जानकर अचरज हुआ कि यहाँ इस समय बसन्त का सीजन चल रहा है और गर्मी यहाँ जुलाई में शुरु होती है, जिसमें तापमान मुश्किल से 30 डिग्री पार होता है। (हालाँकि इस बार यूरोप में तापमान के पिछले रिकॉर्ड टूटने की खबरें पढ़ने को मिली हैं) यहाँ शहर के भवन, गलियाँ व सड़कें पूर्वचर्चित अंदाज में साफ, सुव्यवस्थित एवं भव्य उपस्थिति दर्ज करा रही थी।
शनिवार यहाँ, विकेंड का पहला दिन था। लोग परिवार के साथ बाजार एवं पार्क में आनन्द ले रहे थे। रास्ते में पहला फब्बारा मिला, जो शेर, इंसान, सर्प आदि के चित्र के बीच एक अद्भुत सृष्टि का सृजन कर रहा था, ऐसा दृश्य हमारे लिए एकदम नया और कौतुक का विषय था। पता करने पर स्पष्ट हुआ कि यह शिल्प बाईबिल की कथा पर आधारित है, जिसमें सृष्टि के प्रलय एवं नई सृष्टि की रचना के समय की कथा अंकित थी, जिसमें जल प्रलय व नाव की बात की गई है। लगा कि थोड़े-बहुत पात्रों की भिन्नता के साथ कथा का मूल एक जैसा है, जैसा हम सृष्टि प्रलय के समय मनु, सप्तऋषि एवं नाव की बात अपने धर्मग्रँथों में पाते हैं। लगा कि यह भी एक शोध का विषय हो सकता है, कि विभिन्न धर्मों के तार किस तरह से एकसमान सार्वभौम सत्य एवं तथ्यों से जुड़े हुए हैं।
चेस्टनेट के फूलों से लदे वृहद वृक्षों की छाया के तले बढ़ते हुए हम शहर के बीच सड़क पर पहुँचते हैं, जहाँ बस सर्विस के साथ ट्राम भी चल रही थी। बसें यहाँ की भारत की तुलना में काफी लम्बी होती हैं। पूर्व चर्चित ट्रैफिक अनुशासन के साथ यहाँ स्पीड़िग की समस्या कहीं-कहीं दिख रही थी। कुछ जोशीले युवा बाईक व कारों में स्पीड़ के थ्रिल को आजमाते दिख रहे थे, जो भारतीय शहरों में भी एक आम दृश्य रहता है।
रास्ते भर हम हरे-भरे ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के बीच सुंदर भव्य शहर को निहारते हुए आगे बढ़ते रहे। ट्राम के ट्रेक को पार कर हम बर्दा नदी के ऊपर बने पुल पर थे। पुल के नीचे बहती नदी, इस पर चल रहे मोटरवोट नुमा जहाज, हल्की धूप के बीच शीतल हवा के झौंके व उत्साह से भरे लोगों की चहल-पहल सब मिलाकर अद्भुत एवं दिलकश नजारा पेश कर रहे थे। सामने दूर पहाड़ियों पर भव्य संरचनाएं बहुत सुंदर लग रही थी, जो यूनिवर्सिटी के विस्तारित परिसर के भवन थे।
सामने नीचे की ओर नदी पर एक तार पर संतुलन साधे एक नग्न पुरुष, एक हाथ में तीर तो दूसरे में लाठी लिए नदी पार कर रहे थे। यह बिडगोस्ट का एक महत्वपूर्ण लैंडमार्क है। लगा जैसे यह पथिक को जीवन का संदेश दे रहा हो। लक्ष्य भेदन के लिए निकले पथिक को, पतली रस्सी पर नदी की मझधार जैसी विकट स्थिति में फंसे होने के बावजूद लक्ष्यभेदन की तत्परता एवं एकाग्रता का संदेश दे रहा था। पता चला कि यह बूत 2004 में बना है। पतली तार पर इसका संतुलन कैसे बना है, यह अभी तक हमारे लिए एक राज था।
इस क्षेत्र को शहर का ह्दय क्षेत्र माना जाता है, क्योंकि आदिकाल से नदी के किनारे का यह क्षेत्र व्यापार का मुख्य केंद्र रहा है। साथ ही इसके चारों ओर कई पुरातन भव्य चर्च, कई म्यूजियम और कलाकेंद स्थित हैं, जो शहर के इतिहास को समेटे पेंटिंग, मूर्तियों व दस्तावेजों के साथ समृद्ध हैं। इनकी परिक्रमा आपको यहाँ के सांस्कृतिक पक्ष को समझने में मदद करती है और विकेंड में यहाँ लोगों की विशेष भीड़ रहती है। यह सब देखते हुए यहाँ के लोगों में अपनी कला एवं संस्कृति के प्रति पर्याप्त जागरुकता प्रतीत हुई। शहर की स्थापना एवं विकास का श्रेय सम्राट काजिमिर महान को जाता है, जिन्होंने सन 1343 में इसकी नींव  रखी थी, यहाँ के सामाजिक कानून दिए थे और पत्थरों की जगह ईँटों के प्रयोग की विधि खोजी थी। स्टेच्यू के बग्ल के संग्राहलय में यहाँ के लोकजीवन, युद्ध, स्वतंत्रता संघर्ष, दासता एवं पुनः आजादी का रोचक एवं रोमाँचक इतिहास दर्ज है।
शहर 245 किमी लम्बी बर्दा नदी के किनारे पर बसा है, जो आगे विस्तुला नदी में मिलती है, जो पौलैंड की सबसे बड़ी नदी(लगभग 1500 किमी) है, जो आगे चलकर बाल्टिक सागर में समा जाती है।
यहाँ के पुल को पारकर हम यहाँ की साफ-सुथरी पारम्परिक गलियों से होते हुए पुराने टापू शहर की परिक्रमा करते हुए ओपेरा हाउस से होते हुए पुनः पुल तक बापिस पहुंचते हैं। हर गली, मोहल्ले, दुकान, पार्क एवं रेस्टोरेंट में लोगों को परिवार के संग जीवन को उत्सव की तरह मनाते देखा। विकेंड का यह उत्सवनुमा माहौल हमें दिलचस्प लगा। पता चला कि यहाँ लोग सप्ताह के पांच दिन जमकर काम करते हैं, मेहनत करते हैं, कमाते हैं और विकेंड में अपने परिवार के साथ, बच्चों के साथ पूरा आनन्द मनाते हैं। अपने देश में सप्ताह भर काम के बोझ में दबे अधिकाँश भारतीयों के लिए यह एक अनुकरणीय पहलु लगा। रास्ते में ही हमें शहर के एकमात्र भारतीय रेस्टोरेंट रुबरु के दर्शन हुए, जहाँ हम अगले दिन पधारने वाले थे।

इसी टापू पर दो अन्य म्यूजियम में भ्रमण का मौका मिला। विकेंड में यहाँ निशुल्क प्रवेश रहता है। एक एव्सट्रैक्ट कला पर आधारित था, जिसे समझना व ह्दयंगम करना हमारे लिए सदा ही कठिन रहता है। माड्रन आर्ट के नाम पर ऐसी विचित्र कलाकृतियां व चित्र हमारे लिए सदा ही पहेली रहते हैं, लेकिन दर्शकों का खासी संख्या देख लगा कि इसको समझने वाले लोगों की भी कमी नहीं, हालांकि वे क्या समझ पा रहे थे, मिलकर रोचक चर्चा हो सकती थी, लेकिन यह आज संभव नहीं था। दूसरा म्यूजियम हमें अपने अनुकूल लगा, जिसमें यहाँ की प्रकृति, ग्राम्य-शहरी जीवन, यहाँ के कलाकार, महापुरुषों एवं विभूतियों का संग्रह था। म्यूजियम के बाहर लोग हरे-भरे वृहद वृक्षों की छाया तले चर्चा करते हुए मिले।
फिर हम बर्दा नदी से निकली नहरनुमा धारा के संग टापू पर पहुँचे। पार्क में बच्चे, बुढ़े, जवान सब मखमली लॉन पर पूरा एन्जॉय कर रहे थे। बड़े-बुजूर्ग बैठे गुप्तगुह कर रहे थे, तो बच्चे-किशोर खेल रहे थे। यहाँ की मौज-मस्ती एवं उत्सवनुमा माहौल का आलम ह्दयस्पर्शी था। फूलों से लदे वृक्ष, हरे भरे पेड़, यहाँ के सुंदर भवन सब मनोरम नजारा पेश कर रहे थे। डोमिनिका से पता चला कि टापू पौलेंड के सबसे बड़े पार्क का खिताब लिए हुए है।
फिर हम बर्दा नदी पर बने लबर्ज पुल को पार करते हैं, जिसमें ताले बाँधे दिखे, जिन्हें प्यार की मन्नत का प्रतीक माना जाता है। इस पुल से जुड़ी किवदंतियां भी सुनने को मिली कि एक बार तो यहाँ इतने लोग इकट्ठा हो गए थे कि पूरा पुल ही ध्वस्त हो गया था। सामने ऑपेरा हॉउस था, जिसमें यहाँ के लोकप्रिय सांस्कृतिक कार्यक्रम का अवलोकन हम अगले दिन करने जा रहे थे।
इस तरह पूरी परिक्रमा के बाद हम पुनः बर्दा नदी पर बने स्टेच्यू पुल पर थे। शाम का धुंधलना छा रहा था, यहाँ से बापस ट्राम रेल्वे को पार करते हुए हम पुनः पैदल वॉक करते हैं। आवश्यक समान खरीदने के लिए रास्ते में हम एक बड़े स्टोर में प्रवेश करते हैं, यहाँ के दूध, चीनी, फल आदि से परिचित होते हैं। स्टोर से ज्बेल्को(सेब), और मलेको(दूध) व शक्कर आदि लेते हैं। ग्राऊजी(हमारा पैसा) व ज्लोटी(वहाँ का रुपया) में अंतर आज समझ आ रहा था, जब हम नामसमझी में ग्राऊजी को ज्लोटी मान दुकानदार से सामान खरीद रहे थे।
रास्ते में शहर के रेडियो स्टेशन के दर्शन हुए। सड़क के दोनों ओर सफेद फूल से लदे पेड़ बहुत सुंदर लग रहे थे। इन्हीं के बीच चलते हुए बापस पार्क से होकर विश्राम स्थल तक आते हैं। पूरे रास्ते भर हमारे साथ मौसम की विशेष कृपा रही। सुबह से बादल छाए थे, दिन में बरसे, लेकिन शाम को मौसम साफ रहा। यह आज का ही नहीं अगले पूरे सप्ताह भर की कहानी रही। सभी कहते रहे कि आप मौसम के बारे में सौभाग्यशाली हो, क्योंकि पिछले सप्ताह यहाँ खतरनाक ढंग से आँधी-तुफान के साथ बारिश हुई थी। मौसम विभाग की भविष्यवाणी के हिसाब से, यहाँ दिन में 60 से 90 फीसदी बारिश की भविष्यवाणी घोषित थी, लेकिन पहले दिन विश्वविद्यालय से लिया छाता अंतिम दिन तक कभी काम नहीं आया।
इस तरह दूसरे दिन शनिवार की बुद्ध पूर्णिमा का समाप्न होता है। यहाँ के शहर, इसकी मार्केट, विश्वविद्यालय परिसर व ह्दयक्षेत्र मिल्स टापू आदि से मोटा-मोटा परिचय होता है। यहाँ के समाज, संस्कृति, जीवन शैली, इतिहास भूगोल से हल्का सा परिचय होता है। एक अजनवी देश में अपने अनुकूल वातावरण का निर्माण होता देख उस सूक्ष्म गुरुसत्ता की उपस्थिति का तीव्र भान हो रहा था, जिसके हाथों जीवन की वागड़ोर एक कठपुतली की तरह सौंप हम आगे बढ़ रहे थे। (जारी...)