Tuesday, 28 February 2017

मत खोना अपनी ध्येय-दृष्टि



आँधी-तुफाँ-ओलों की बारिश, लो इनका भी मजा


यह संसार काँटे की बाड़ी,
यहाँ कितने खिलाड़ी, 
एक तू मूर्ख, गंवार, अनाड़ी।

ऊँची सोच, अलग होने की सजा,
आँधी-तुफाँ-ओलों की बारिश, 
लो इनका भी मजा।

साधना में रही चूक कहीँ, 
कहीं नाव में छल-छिद्र बाकि,
मर्म पर प्रहार होते आए सदा, 
भूल गए तुम संसार की रीत पुरानी।

फिर, संसार एक महान जिम-अखाड़ा, 
देना होगा यहाँ रहने का भाड़ा,
सीख लो तुम भी दाँव इस दंगल के, 
असल काम तो अभी पड़े अधूरे।

परिवर्तन का यह प्रवाह शाश्वत, 
सभी अपनी चाल चलेंगे,
नहीं कोई परमहंस भगवान यहाँ, 
सभी इंसान, यही करेंगे।

फिर वजूद, शाश्वत बक्रता संग 
प्रसुप्त देवत्व की विचित्र सृष्टि,
झूठ-सच, गफलत, प्रपंच-विवाद सब यहाँ, 
मत खोना अपनी ध्येय-दृष्टि।

संग स्वल्प भी सत्य-ईमान गर अंतर में, 
तो नहीं दूर दैवीकृपा वृष्टि,
हर दुख को बना तप, हर सुख को योग, 
गढ़ता चल अपनी संकल्प-सृष्टि।
 

2 comments:

  1. जो व्यक्ति निरंतर आँधी, तूफां और ओले की बारिश में रहता आया... वो भी अतुलनीय आत्मसंतुष्टि के साथ... आनंद को पूर्णता में महसूस करते हुए... सबसे बड़ा खिलाड़ी तो मेरी नज़र में वही है, बाकी जो खुद को खिलाड़ी मान रहे हैं, कब वक़्त के साथ परिभाषा बदल जाए... कोई निश्चित तो नहीं...

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  2. bahut hee steek aur sargarbhit tippani Swapnesh.Waki duniyan ka ye khel tamasha chalta rahega, sabki apni-apni manjil hei aur apni-apni rah.Bhagwan sabko sabbudhi dei, sbko khush rakhe!

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