Sunday, 20 March 2016

यात्रा वृतांत – अमृतसर सफर की कुछ यादें रुहानी, भाग-1



यह हमारी दिन के उजाले में अमृतसर की पहली यात्रा थी। सामुदायिक रेडियो की कार्यशाला के उद्देश्य से अमृतसर जाने का संयोग बना था। कार्यशाला के व्यस्त शेड्यूल के बीच अधिक घूमने की गुंजाइश न थी। सो तीन दिवसीय कार्यशाला में फुर्सत के पलों में दूसरे दिन स्वर्ण मंदिर जाने का सुयोग बना और अंतिम दिन विदाई समारोह के बाद, ट्रेन की वापसी के बीच के समय में डेरा व्यास दोनों यात्राएं एक वेजोड़ रुहानी अनुभव के रुप में स्मृति पटल पर अंकित रहेंगी।
11 मार्च को ही सुबह हम दून-अमृतसर एक्सप्रेस से 800 बजे अमृतसर पहुंच चुके थे। रास्ते में ही सुबह हो चुकी थी। सो बर्थ से उतरते ही बाहर ट्रेन के दोनों ओर हरे भरे गैंहूं से लहलहाते खेत हमारा स्वागत कर रहे थे, जिनका हरियाली भरा नजारा आंखों को शीतलता और मन को ठंडक दे रहा था। रास्ते में फलों के बगीचे भी दिख रहे थे, संभवतः फूलों को देखकर नाशपाती, बागुकोषा के लग रहे थे और कहीं कहीं आम के। लेकिन बहुतायत में गैंहूं के खेत ही मिले। अमृतसर शहर के बाहर ट्रेन किसी पुल के नीचे काफी देर खड़ी रही। संभवतः हम शहर में प्रवेश कर चुके थे। यहाँ से पुल से आवागमन करती गाड़ियों, पुल के पास सफेदा के ऊँचे ऊँचे पेड़, सामने से गुजरती दूसरी लोक्ल ट्रेन और इनमें भाग दौड़ करती लोक्ल सवारियों की कवायद, सब तमाशे की तरह हम देख रहे थे। इसी बीच चाय की चुस्की के बीच इंतजार के इन पलों को यादगार बनाते रहे।
रास्ता खुलते ही थोड़ी देर में ट्रेन आगे बढ़ चुकी थी और कुछ ही मिनटों में हम अमृतसर स्टेशन पर थे। ओवरब्रिज को पार करते हुए हम स्टेशन के बाहर निकले। स्टेशन का प्रवेश द्वार अपने ऐतिहासिक वास्तुशिल्प के साथ अपनी विशिष्ट पहचान व परिचय दे रहा था। स्टेशन के पीछे पार्किंग के पार पीपल और वट के विशाल पेड़ यहाँ के पुरातन इतिहास की गवाही दे रहे थे। अपना गन्तवय अधिक दूर नहीं था। सो हमने रिक्शा में ही जाना उचित समझा, ताकि शहर का पूरा नजारा ले सकें। आसमान में बादल छाए हुए थे। काले काले बादल कभी भी बरसने की चेतावनी दे रहे थे। रात को शायद बारिश हो भी चुकी थी। जैसे ही हम आगे बढ़ते गए हल्की हल्की बारिश शुरु हो चुकी थी। हम इसको अपना स्वागत अभिसिंचन मानते हुए इसका आनन्द लेते रहे। रास्ते में सेमल के गगनचुम्बी वृक्षों पर लदे सुर्ख लाल फूल शहर में वसंत की वहार का परिचय दे रहे थे। आम के पेड़ों पर फूटे बौर भीनी-भीनी खुश्बू के साथ यात्रा का सुखद अहसास दे रह। झंडों से जड़े चौराहे को पार करते हुए हम आगे ऊँचे और भव्य भवनों के बीच बढ़ रहे थे। 
कुछ ही मिनटों में हम अपने गन्तव्य स्थल पर पहुँच चुके थे। अभी वर्कशॉप में आधा घंटा बाकि था, सो फ्रेश होकर हम सीधा कार्यशाला कक्ष पहुँचे। दिन भर कार्यशाला से सामुदायिक रेडियो की अवधारणा स्पष्ट हुई और समझ आया कि कैसे यह पब्लिक और प्राइवेट ब्रॉडकास्टिंग से भिन्न है। सफलतापूर्वक चल रहे सामुदायिक रेडियो के अनुभव बहुत प्रेरक और उत्साहबर्धक लगे। अगले दो दिनों में सामुदायिक रेडियो के विभिन्न पहलुओं से रुबरु होते रहे। सदस्यता पाने के लिए फार्म भरने की बारकियाँ समझ में आईं। बेसिल के प्रेजन्टेशन से आवश्यक तकनीकि जानकारियाँ मिली। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से आए डॉ. मुनीश जी का भागीदारों से सीधा संवाद बहुत ह्दयस्पर्शी लगा। सबसे ऊपर कैंपस रेडियो के पितामह एस श्रीधरण जी से सीधा संवाद इस कार्यशाला की जान रहा। अंत में सीआरए टीम द्वारा सक्रीनिंग ड्रिल के साथ हम कार्यशाला से सीखे ज्ञान को एक सार्थक अनुभव के रुप में समझने का मौका मिला। जम्मु-काश्मीर, पंजाव, हरियाणा, उत्तराखण्ड और हिमाचल से लगभग 40 भागीदार आए थे। मीडिया हाइप के इस युग में सामाजिक परिवर्तन के एक सार्थक माध्यम के रुप में सामुदायिक रेडियो की उपयोगिता समझ में आ गयी।



स्वर्ण मंदिर – दूसरे दिन शाम को फुर्सत के पलों में स्वर्णमंदिर जाने का कार्यक्रम बना। बिना स्वर्ण मंदिर के अमृसर की यात्रा को अधूरा ही मान जाएगकब से यहाँ आने की योजना बन रह थी। पिछले ही साल दिसम्बर माह में लुधियाना में अपने 1986 बी.टेक. बैच की 25वीं साल गिरह पर अपने सहपाठी कंवलजीत आनन्द के साथ रात को 2 बजे ही यहाँ चल दिए थे और सुबह पाँच बजे से इसके दर्शन लाभ का सुअवसर मिला था। यह दर्शन एक अमिट सी छाप रुह पर छोड़ चुका था। स दिन एक झलक ही ले पाए थे। आज उसका अगला कदम बढ़ाने का सुयोग बन रहा था। हल्की बारिश के बीच रास्ते की तमाम बाधाओं को पार करते हुए हम गुरुद्वारा गेट पहुँचे। बहाँ से परिसर की भव्यता देखते ही बनती है। जुता स्टैंड पर जुता उतारकर हम अंदर प्रवेश किए। जुता स्टैंड पर सेवादारों का सेवाभाव दिल को छूने वाला रहता है। आगे जल बावड़ी को पार करते हुए मुख्य गेट पर पहुँचे। यहाँ प्रवेश करते ही सामने स्वर्ण मंदिर का विहंगम दृश्य एक आलौकिक अनुभव रहता है। आकाश में चाँद, सरोवर के जल में झिलमिलाती स्वर्णिम व रंगविरंगी आभा, एक दूसरे लोक में विचरण की अनुभूति देते हैं। 

ज्ञातव्य हो कि यहाँ के पवित्र सरोवर के नाम से शहर का नाम अमृतसर पड़ा है। मान्यता है कि यहाँ कभी घना जंगल था और इनके बीच में झील। यह शांत-एकांत स्थल साधु संतों की साधना स्थली, आश्रय स्थली थ बुद्ध भगवान ने भी यहाँ ध्यान तप किया था। श्री गुरु नानक देव जी ने इस स्थल में ास किया था। सिक्खों के चौथे गुरु राम दास ने इसकी नींव रखी और पांचवे गुरु अर्जुनदेव के समय में यह 1604 ईंस्वी में बनकर तैयार हुआ। सरोवर के मध्य रमंदिर साहिव में गुरुग्रंथ साहब की पूजा-अर्चना व पाठ प्रातः भौर से लेकर देर रात तक चलता रहता है, और इनकी पावन धुन से तीर्थ परिसर गुंजायमान रहता है।

दर्शनार्थ आयी भीड़ में एक अनुशासन, दर्शन का भाव, एक सकारात्मक लय, गुंज रहे शब्दकीर्तन की दिव्य ध्वनियाँ एक जीवंत जाग्रत तीर्थ का गाढ़ा अहसास देते हैं। इसके साथ ही सरोवर में निश्चिंत भाव से तैर रही मच्छलियाँ, संसार सागर में भटक रहे मनुष्य जीवन के गुढ़ रहस्य को प्रकट करती हैं, कि गुरु शरण में आया जीव संसार सागर में इन मच्छलियों सा निर्दन्द-निश्चिंत भाव से तैर सकता है, जीवन का सही आनन्द उठा सकता है। गुरुभाव से कटा जीव सामान्य मछलिों की भांति तमाम असुरक्षा भाव के बीच एक एक दुःखी-संतप्त जीव जीने के लिए अभिशप्त होता है।

सरोवर के किनारे परिक्रमा मार्ग पर दायीं ओर से आगे बढ़ते हुए मुख्य द्वार आता है, जहाँ से सीधे हरमंदिर साहब में प्रवेश होता है। दर्शनार्थियों के साथ हम आगे बढ़ते हुए धीरे धीरे मुख्य मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। शब्द कीर्तन की धुन अंतःकरण में दिव्य भावों का संचार कर रही थी। संगत बीच बाले पथ पर पाठ करते हुए आगे बढ़ रही थी। मुख्य द्वार के पार अंदर गुरु ग्रंथ साहिव को माथा टेककर हम बाहर निकले। पीछे सरोवर के अमृत जल से अभिसिंचन करते हुए आगे बढ़े, प्रसाद लेकर परिक्रमा पथ पर आगे बढ़े। लगभग एक-ढेड़ घंटे खडे खड़े पैर थककर चूर हो चुके थे, सो कुछ पल किनारे में बिछी दरियों पर पाल्थी मारकर...ध्यान चिंतन में कुछ पल निमग्न रहे।

इसके बाद लंगर हाल में आए। यहाँ तीन मंजिलों में प्रसाद का वृहद आयोजन देखने लायक था। हजारों लोग एक साथ प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। पता चला कि रोज लगभग एक लाख दर्शनार्थी इस लंगर में भोजन-प्रसाद ग्रहण करते हैं। यहाँ की अनुशासन, व्यवस्था देखने लायक थी कि किस तरह व्यवस्थित ढंग से सबको प्रेम पूर्वक प्रसाद का वितरण हो रहा था। सदा से ही गुरुद्वारे की लंगर व्वस्था के हम मुरीद रहे हैं। किसी भी गुरुद्वारे में यह पारमार्थिक व्यवस्था अनुकरणीय लगी है। भोजन-प्रसाद के बाद बाहर हम आए तो स्वयं सेवक जूझे बर्तनों को हाथ से लेते गए। गिलास, प्लेट व वर्तनों को साफ करने की स्वयंसेवक व्यवस्था लाजबाव दिखी। सैंकड़ों नहीं हजारों सेवादार यहाँ सफाई कर रहे थे। एक प्लेट कई चरणों में साफ होकर चकाचक साफ होकर बाहर निकल रही थी। अपनी सेवा में कोई छोटे बढ़े का भाव नहीं। सब अपनी पहचान, पद, जाति, धर्म, रुत्वा भूल कर गुरुकाज में एक भक्त की भांति मग्न – शायद यही तो आध्यात्मिक समाजवाद है, जिसके आधार पर युगऋषि सतयुग की कल्पना करते रहे हैं।
परिसर के परिक्रमा पथ पर बापिस आते हुए, हम स्वर्ण मंदिर को प्रमाण कर, बाहर जुता घर की ओर आएयहाँ से ऑटो से बापिस गन्तव्य की ओर कूच किए, चित्त पर स्वर्ण मंदिर की एक भाव भरी अमिट छाप लिए हुए, कि अगली वार थोड़ा अधिक समय लेकर इसके दर्शन करेंगे, यहाँ के भावसागर में ओर गहरी डुबकी लगाएंगे ।.........जारी।

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